ये दिल्ली है मेरी जान

नतीजे आएंगे 10 फरवरी को आएंगे सब को पता था, जनादेश आया पर ऐसा जनादेश होगा ये किसी को नहीं पता था। काफी समय से दिल्ली के संदर्भ मे एक पंक्ति सुनता आ रहा हूँ “ये दिल्ली है मेरी जान”। सच कहूँ तो आज ये बात सच भी लग रही है, ये दिल्ली ही है जिसने 8 महीने पहले लोकसभा के चुनाव मे जिस दल ओर जिस इंसान को अपना सब कुछ दे दिया था उससे आज सब कुछ वापस भी ले लिया। जिसे देश के बहुत से राज्य नहीं नकार सके उसे दिल्ली ने इस कदर नकार दिया जैसे वो कभी थे ही नहीं। दिल्ली विधानसभा के गठन के बाद यह पहला मोका है जब कोई दल दिल्ली विधानसभा मे इतने प्रचंड बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाने जा रहा है।

5 saal kejriwal

चुनाव लड़ा तो 3 मुख्य दलों ने परन्तु नतीजे सिर्फ 2 ही दलों के आए। केजरीवाल की पार्टी 67 सीटे जीतने मे कामयाब हुई जो की कुल का 95 प्रतिशत से भी ज्यादा है। हम कह सकते है की काँग्रेस तो पूरे देश भर मे संघर्ष कर रही है पर संघर्ष के इस दौर मे वो इस कदर हाशिये पर पहुँच जाएगी की उसका खाता भी नहीं खुलेगा वो भी एक ऐसी जगह पर जहा लगभग 1 साल पहले 15 साल तक उसकी सरकार थी, ये किसी ने नहीं सोचा था।

हालात तो भारतीय जनता पार्टी के भी कुछ खास नहीं है। 15 महीने पहले इसी दिल्ली मे हुये दिल्ली विधानसभा चुनाव मे जो पार्टी 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभरी थी ओर 8 महीने पहले हुये लोकसभा चुनाव मैं दिल्ली की 7 की 7 सीटे जीती वो पार्टी 3 सीटों पर सिमट के रह गई। ऐसा क्या हुआ इन 8 महीनों मे जो बात इस कदर बिगड़ गई। इस मोके पे जनता के लिए मुझे बशीर बदर की एक लाइन याद आती है “कुछ तो मजबूरीयां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता”।

गलतियाँ तो भारतीय जनता पार्टी ने की, जिनमे से एक बड़ी गलती नकारात्मक चुनाव प्रचार को माना गया। हाँ सच है की दिल्ली चुनाव मैं भाजपा की हार की यह एक वजह रही पर क्या इतनी बड़ी हार के लिए इतना कह देना काफी होगा। भाजपा की चुनाव रणनीति लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक मोदी के इर्द-गिर्द घूमती रही पर जब बारी दिल्ली की आई तो भाजपा को एहसास हुआ की दिल्ली मैं केजरीवाल एक कठिन चुनौती है तो भाजपा ने मोदी की जगह केजरीवाल के ही साथ रही किरण बेदी को दिल्ली मे भाजपा के नए चहरे के रूप मे उतारा। यहाँ भाजपा अपनी ही चली चाल मे धिरती दिखाई दी, किरण बेदी जो अपने बेबाक स्वभाव के लिए जानी जाती भाजपा मे आते ही उसके रंग मे रंग गई ओर कुछ दिन बाद तो उनकी जुबान भी बंद कर दी गई फिर वो सिर्फ भाजपा ओर मोदी का गुणगान करने लगी ओर केजरीवाल पर निशाना साधती रही। मोदी खुद भी मैदान मे उतरे तो विकास की जगह केजरीवाल पे निशाना साधते रहे उन्हे नक्सली ओर जंगली तक बोल डाला। केजरीवाल की मदद के लिए भाजपा के अन्य नेताओं ने भी कुछ सांप्रदायिक बयान दिये ओर व्यक्तिगत हमले किए।

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इसी के विपरीत केजरीवाल ने जनता के सामने विकास की बातें की ओर किसी भी तरह से व्यक्तिगत प्रहार करने से बचे। केजरीवाल ने अपनी वही आम आदमी की छवि बरकरार राखी ओर जनता के बीच गए। केजरीवाल ने अन्य दलों के विपरीत अपनी गलतियों के लिए जनता से माफी मांगी। जनता को भी लगा की आजादी के बाद पहला नेता आया है जो अपनी गलतियाँ छुपाने की जगह उन्हे मान रहा है ओर उनके लिए माफी भी मांग रहा है। पहली बार कोई नेता ओर पार्टी ऐसी आई जिसने शाही इमाम की वोट अपील को नकार दिया। इस काम मे काँग्रेस ने भी केजरीवाल की मदद की, जो भारतीय जनता पार्टी ओर मोदी पर लगातार हमले करती रही।

इस चुनाव के बाद सभी राजनेतिक दलों को एक साफ संदेश गया “ये दिल्ली है सब जानती है”। यहा एक ही आधार पर जीता जा सकता है ओर वो है काम करके। भाजपा जो ये समझ बैठी थी की अब वो एक अजेय पार्टी है ओर इसी घमंड मे उसने दिल्ली मे न तो चुनाव घोषणा पत्र देना जरूरी समझा ओर पुराने नेताओं को एक झटके मे किनारे कर दिया। भाजपा ये समझ बैठी थी की वो जो भी करे जनता उसका साथ देगी ओर दिल्ली ने अपना फैसला सुना के भाजपा को आत्ममंथन करने पे मजबूर कर दिया।

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