आजाद भारत का काला दिन – 25 जून 1975

आज से 40 साल पहले आज ही के दिन 25 जून 1975, जिसे आजाद भारत के इतिहास का एक काला दिन कहा जाता है, क्योंकि इस दिन इन्दिरा गांधी सरकार द्वारा पूरे भारत में आंतरिक इमरजेंसी (आपातकाल) लागू की गई थी। हालांकि इसे दिन कहना गलत होगा क्योंकि सब कुछ रात के अंधेरे में हुआ था और अगले दिन सुबह तक प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के अभिभाषण से पहले किसी को पता नहीं था की क्या हुआ है।

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ऐसी बात भी नहीं है की देश में यह पहली इमरजेंसी थी इससे पहले भी 1962 में चीन युद्ध और 1971 में पाकिस्तान युद्ध के समय देश में आपातकाल लगाया गए था, पर इससे पहले कभी एक आम भारतीय का जीने का अधिकार नहीं छीना गया था। शायद इसी कारण इस दिन को काला दिन कहा जाता है और रात को एक काली रात का नाम दिया जाता है।

यह काम आजाद भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने किया, पर जिस तरह से यह कदम उठाया गया शायद ही इसके लिए कोई उन्हें माफ कर सकता है। इमरजेंसी के एक साल पहले इंडिया इज इन्दिरा, इन्दिरा इज इंडिया का नारा लगाने वाले भारतवासी खुद इन्दिरा को कोसने लगे थे। हालांकि इन्दिरा ने यह फैसला कथित तौर पर जय प्रकाश नारायण (जेपी) के उस बयान के कारण लगाई गई जिसमें उन्होंने पूरे देश की सेन्य शक्तियों को सरकार द्वारा दिये गए ऐसे आदेश जो अनैतिक हो को ना मानने की और उनका विरोध करने की अपील की थी।

क्या यही एकमात्र कारण था जिसके कारण रातों रात पूरे देश में आपातकाल लगाने की जरूरत आ पड़ी? क्या यह फैसला खुद इन्दिरा गांधी का था? क्या सब कुछ नियमों के आधार पर हुआ था? क्या आपातकाल लगाने का फैसला उसी रात 25 जून की रात को लिया गया?

1975

देखा जाए तो आपातकाल की रात 25 जून से 13 दिन पहले 12 जून को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन्दिरा गांधी को चुनाव में सरकारी तंत्र के गलत इस्तेमाल का दोषी ठहराते हुये उनके चुनाव को रद्द कर दिया था और उनकी विधानसभा की सदस्यता रद्द करते हुये उन्हें अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने से भी प्रतिबंधित कर दिया था। उसके बाद इन्दिरा ने इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की जिसमें उनकी याचिका को सुना गया और 24 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी गई। लेकिन उनको विधानसभा सदस्य के तहत मिलने वाली सभी सुविधाओं को रद्द कर दिया गया और उनके किसी भी मसले पर वोट करने के अधिकार को भी उनसे छिन लिया गया। हालांकि कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने दिया। ठीक इस फैसले के बाद जेपी ने वो भाषण दिया, जिसे आपातकाल का कारण बताया जाता है।

पर क्या इसी एक दिन में सभी तैयारियां कर ली गई और आपातकाल का मसौदा तैयार किया गया। नहीं, आपातकाल की तैयारी उस फैसले के आने से पहले से चल रही थी। तैयारी करने वाले लोगों में मुख्य थे इन्दिरा गांधी के खास माने जाने वाले पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और इन्दिरा के बेटे संजय गांधी। कहा यह भी जाता है की इन्दिरा गांधी खुद इस्तीफा देना चाह रही थी पर सिद्धार्थ शंकर रे और संजय गांधी ने उन्हें रोका और उच्च न्यायालय में फैसले के खिलाफ अपील करने का फैसला किया। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद जेपी ने कहा की जो भी सरकारी आदेश तुम्हारी आत्मा के खिलाफ हो उसे हरगिज मत मानो क्योंकि यह महात्मा गांधी का हुक्म था। जेपी ने कहा की हजारों की तादाद में जनता जाएगी और एक और सत्याग्रह किया जाएगा। इसी फैसले के तुरंत बाद इन्दिरा ने आंतरिक आपातकाल की तैयारी कर ली।

उस शाम इन्दिरा के साथ मौजूद थे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे, उनके सलाहकर आरके धवन और बेटे संजय गांधी। हालांकि इन्दिरा गांधी के सलाहकार आरके धवन के मुताबिक इन्दिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे के साथ मिल कर आपातकाल लगाने की तैयारी जनवरी 1975 में ही कर ली थी, पर इसको लागू 25 जून की रात को किया गया था। संजय गांधी के साथ मौजूद थे गृह राज्यमंत्री ओम मेहता, दिल्ली के राज्यपाल कृष्णचंद, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंशी लाल जिनके इशारे पर आपातकाल के दौरान हुई सभी गिरफ्तारियों की सूची तैयार करने की ज़िम्मेदारी थी।

इसी दिन शाम को इन्दिरा गांधी अपने सचिव आरके धवन और सिद्धार्थ शंकर रे के साथ राष्ट्रपति से मिले पहुंची और उन्हें सारे हालत और कानून से अवगत करने के बाद देर रात 11 बजकर 20 मिनट पर राष्ट्रपति को आरके धवन के हाथों आपातकाल लागू करने हेतु दस्तावेज़ सोंप दिये गए, जो राष्ट्रपति ने बिना देर किए हस्ताक्षर कर दिये और पूरे देश में आपातकाल लागू हो गया। भारत का लोकतंत्र इन्दिरा गांधी के हाथों में आ गया। अब ना तो कोई उनसे ऊपर था, ना ही कोई उनके फैसलों के ऊपर सवाल उठा सकता था।

रात के 12 नहीं बजे थे और पूरा भारत जब चैन की नींद सो रहा था तो प्रधानमंत्री निवास में आपातकाल के बाद देश को चलाने को लेकर चर्चा चल रही थी। चर्चा के केंद्र में थे संजय गांधी और सिद्धार्थ शंकर रे। ये तो हुई आपातकाल लगाने तक की कहानी पर उसके बाद सत्ता किसे मिली? उसका कैसे दुरुपयोग किया गया? किसके द्वारा किया गया?

इन सभी सवालों का जवाब जानने के लिए इंतेजार करना होगा 26 जून 2015 को आपातकाल के दूसरे भाग का, जो उसी दिन की कहानी है।

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