अस्मिता ओर अस्तित्व का चुनाव

दिल्ली चुनाव पिछले दो सालों से देश का काफी महत्वपूर्ण चुनाव रहा है। इस बार भी लगभग पूरे देश की नजरे इस पर टिकी हुई है, कारण साफ है सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव अपनी अस्मिता ओर अपनी तथाकथित मोदी लहर को बचाने का चुनाव है ओर आम आदमी पार्टी के लिए यह अपने राजनैतिक अस्तित्व को बचाने का चुनाव बन गया है। एक ओर दल है जो अपनी राजनैतिक विरासत को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है वो है काँग्रेस जो अभी के हालात मैं हाशिये पर पहुँच चुकी है जहां से उसका इस चुनाव मैं वापसी करना तो लगभग मुश्किल है।

Delhi Elections

चुनाव प्रचार थम चुका है ओर इंतजार है कल होने वाले मतदान का। इसी बीच कुछ अन्य दल भी इस चुनाव मे कूद पड़े है जो चुनाव नहीं लड़ रहे है। इन सभी दलों मे प्रकाश करात की सीपीआई(एम) [CPI(M)], नितीश कुमार की जेडीयू [JD(U)] ओर ममता बनर्जी की टीएमसी [TMC] प्रमुख है। इन दलों ने अपने समर्थकों से आम आदमी पार्टी को अपना मत देने की गुहार लगाई है। इसमे अहम यह है की नितीश कुमार की जनता दल जो बिहार मे काँग्रेस पार्टी के समर्थन से सरकार चला रही है पर दिल्ली मे काँग्रेस की कमजोर पकड़ के मद्दे नजर आम आदमी पार्टी को समर्थन दे रही है, तो मतलब साफ है की किसी भी तरह से भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर किया जाए ओर उनका विजय रथ रोका जाए।

इसी तरह कुछ धार्मिक संगठन भी इस चुनाव मैं कूद पड़े हैं। एक तरफ डेरा सच्चा सोदा ने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया तो दूसरी तरफ शाही इमाम सय्यद अहमद बुखारी ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देने का ऐलान किया है। दोनों के अपने-अपने कारण है पर अगर बात धर्म को राजनीति से अलग रखने की है तो ये कुछ हद तक गलत भी है क्योंकि अपना वोट हर आदमी को अपनी सोच समझ से देना चाहिए, किसी संत, इमाम ओर पादरी के कहने से नहीं देना चाहिए।

Modi and Kejriwal

यह चुनाव शुरुआत से ही मोदी की छवि की अग्नि परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था। चुनाव के शुरुआत समय मे लग रहा था की अन्य राज्यों की तरह भाजपा दिल्ली मैं भी मोदी के नाम पे ही लड़ेगी पर 15 जनवरी को जब किरण बेदी भाजपा शामिल हुई तब से अटकलें तेज हो गई थी की वो भाजपा की ओर से दिल्ली की अगली मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार होंगी। इन अटकलों पे 19 जनवरी को तब मोहर लगी जब प्रत्याशियों की घोषणा के साथ उनके नाम की घोषणा भी मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप मैं कर दी गई। इसे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की सोची समझी चाल भी कहा गया। हालांकि इस पर भाजपा को थोड़ा बहुत विरोध भी सहन करना पड़ा पर अमित शाह ने उसे बढ़ने से पहले ही रोक दिया।

ऐसा भी कहा जाता है की किरण बेदी को बलि का बकरा बनाया गया है क्योंकि अगर भाजपा हार जाती है तो इस बात मे कतई संदेह नहीं है की किरण बेदी को इसका जिम्मेदार ठहराया जाएगा ओर जीतने की स्थिति मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उसका सेहरा पहनाया जाएगा। यह कहा जाना गलत नहीं होगा की भारतीय जनता पार्टी को हार की संभावना का पता पहले से था वरना ऐसी क्या जरूरत आ गई थी की हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड के चुनाव मोदी के नाम पे जीतने ओर जम्मू कश्मीर मैं 25 सीटे जीतने के बाद उसे दिल्ली मैं मुख्यमंत्री का उम्मीदवार धोषित करना पड़ा, वो भी सभी वरिष्ठ नेताओं को किनारे कर के एक 4 दिन पुरानी नेता को।

#GOVOTE

इस चुनाव की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा रहा है की दिल्ली मे देश की सरकार है ओर उस सरकार के प्रधानमंत्री, केबिनेट मंत्री, मंत्री, सांसद सभी सरकार छोड़ कर प्रचार मे शामिल हो गए ये जानने के लिए की दिल्ली के दिल मे क्या है पर जब वो भी इसमे असक्षम रहे तो कल अमित शाह को भी कहना पड़ा की ये दिल्ली के चुनाव परिणाम को मोदी के काम-काज का नतीजा नहीं माना जाना चाहिए है जबकि इससे पहले हर जीत को भाजपा मोदी की सफलता को समर्पित करती थी।

अब कल चुनाव है इस अस्मिता ओर अस्तित्व के चुनाव मैं नतीजा कुछ भी हो कल सभी दिल्ली वासियों को अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग करना चाहिए। अधिक से अधिक मतदान करें ओर किसी के कहने ओर किसी लालच पर ध्यान ना देकर अपनी सोच ओर समझ से मतदान करें चाहे किसी का अस्तित्व बचे या किसी की अस्मत।

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