कलयुग की पहली सुबह – 26 जून 1975

आपातकाल 25 जून 1975 को लगा, इसे आजाद भारत का काला दिन कहा गया, यह आपातकाल 21 महीने तक चला। अगर यह काला दिन था, तो इस 21 महीने के समय को कलयुग कहा जा सकता है। रात को 11 बजकर 20 मिनट पर भारत में आपातकाल लगाया गया, आपातकाल लगाने का श्रेय इन्दिरा गांधी को दिया जाता है। उनके साथ देने वाले नेताओं में थे, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और इन्दिरा के करीबी दोस्त सिद्धार्थ शंकर रे, उनके सचिव आरके धवन, संजय गांधी और गृह राज्य मंत्री ओम मेहता।

इन्दिरा और गांधी परिवार के करीबी कहे जाने वाले आरके धवन के मुताबिक आपातकाल के मुख्य कारण थे सिद्धार्थ शंकर रे। कहा जाता है की आपातकाल के बाद देश की पूरी बागडोर इन्दिरा गांधी के हाथ में आ गई और भारत का शासन सरकार, आदालत, कानून सब इन्दिरा के हाथ की कठपुतली बन गए। संविधान के आलेख 21 के तहत हमें मिलने वाले जीने के अधिकार तक को समाप्त कर दिया गया। लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ इन्दिरा गांधी के गुलाम बन गए।

कुछ साल पहले दिया गया नारा सच हो गया था जिसमें कहा गया था “इन्दिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इन्दिरा”। सवाल है क्या सच में ताकत इन्दिरा गांधी के हाथ में थी, या इन्दिरा के नाम पर देश उनके बेटे संजय गांधी चला रहे था। आपातकाल के बाद के सभी फैसले प्रधानमंत्री आवास 1-सफदरजंग से लिए जा रहे थे, जहां इन्दिरा और संजय दोनों मौजूद थे।

आपातकाल की सूचना चंद राजनेताओं, पुलिस के कुछ अधिकारियों के सिवाय किसी को नहीं थी। उन चंद नेताओं में प्रमुख थे, गृह राज्यमंत्री ओम मेहता, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंशी लाल, सिद्धार्थ शंकर रे और कुछ अन्य आला नेता। ओम मेहता और बंशी लाल के साथ मिलकर राजनैतिक गिरफ्तारियों की योजना बनाई गई। जो भी सरकार और सरकार की नीतियों के खिलाफ था उसे गिरफ्तार करने के आदेश रातों रात दे दिये गए और आदेशों पर अमल भी रातों रात किया गया।

भारत की आजादी में अहम योगदान देने वाले जय प्रकाश नारायण उर्फ जेपी को रात को 2 बजकर 30 मिनट पर दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। उनके साथ मोरार जी देसाई सरीखे नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया। सुबह किसी भी तरह का राजनैतिक विरोध ना हो इसलिए सभी विपक्षियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

बाहर कोई गलत खबर ना आ पाये, इसलिए सभी अखबारों की बिजली काट दी गई और उच्च न्यायालयों को बंद करने के आदेश दिये गए। हालांकि खुद इन्दिरा को सब होने के बाद सिद्धार्थ शंकर रे से इस बात का पता चला। जब सिद्धार्थ ने उन्हें यह बताया, तो इन्दिरा ने कहा की ऐसा कुछ नहीं है। संजय से बात करने के बाद उन्होंने कहा की अखबार छपेंगे, न्यायालय भी खुलेंगे। परंतु ऐसा नहीं हुआ। जो अखबार तैयार हो गए, उन्हें बंटने नहीं दिया गया और जब्त कर लिया गया।

केन्द्रीय केबिनेट को इस बात का पता सुबह 6 बजकर 30 बजे केबिनेट की एक आपात बैठक के अंदर पड़ा। उस बैठक में सभी केबिनेट सदस्यों को आपातकाल की जानकारी दी गई। इसके तुरंत बाद संजय गांधी ने उस वक्त के सूचना एवं प्रसारण मंत्री पूर्व प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को संजय गांधी ने बुलाया और प्रेस सेंसरशिप का कानून लगाने को कहा गया। जिससे अभी अखबार और न्यूज़ चेनल सरकार के इशारे पर काम करने लगे। संजय ने उन्हें सभी खबरें प्रसारण से पहले उन्हें दिखने को कहा।

जब गुजराल ने आनाकानी की, तो इन्दिरा ने बीच में आकर गुजराल को समझाया। उसके बाद 8 बजे आकाशवाणी पर पहली बार प्रधानमंत्री ने देश के नाम संदेश में पूरे देश को आपातकाल लगाए जाने की सूचना दी। उन्होंने कहा की इससे घबराने की जरूरत नहीं है और शांति बनाए रखने की अपील की। इसके तुरंत बाद गुजराल को संजय गांधी ने बुलाया और पूछा की देश के नाम संदेश सभी चेनलों पर क्यों नहीं चलाया गया। उसके बाद संजय और गुजराल में कहासुनी हुई, गुजराल ने इस्तीफा देना चाहा पर उससे पहले गुजराल का मंत्रालय बदल दिया गया।

सुबह होते ही कुछ अन्य नेताओं जैसे लाल कृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी आपातकाल की आड़ में 1 लाख से ज्यादा गिरफ्तारियाँ की गई, कुछ लोगों को यातना दे कर जैल में मार भी दिया गया था।

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लोकतंत्र के अहम स्तम्भ प्रेस को मुक कर दिया गया। नए सूचना प्रसारण मंत्री बने वी. सी. शुक्ल, जिन्होंने प्रेस के पंख काट दिये थे। इसके बाद अखबारों की हर खबर, हर लाइन को पहले सरकार को दिखाना जरूरी हो गया था। अखबार में वही लिखा जा सकता था जिसकी इजाजत सरकार देती थी। इसके विरोध में इंडियन एक्स्प्रेस अखबार ने अपने संपादकीय के स्थान को खाली छोड़ कर इसका विरोध जताया।

आरएसएस और अन्य गैर कोंग्रेसी संगठन थे उनको बंद करने के आदेश दिये गए। देश में कॉंग्रेस के विरोध होना मतलब एक तरह का जुर्म हो गया था। जो साथ है वो है और जो विरोध में है वो जैल में है। आपातकाल में राजनैतिक और मौलिक अधिकार तो छीने गए, सरकारी तंत्र का दुरुपयोग भी किया गया। लेकिन कुछ चीजें ऐसी भी हुई जिनके कारण संजय और इन्दिरा की छवि पूरी तरह से एक खलनायक की बन गई थी।

आपातकाल के अगले भाग में रोशनी डालेंगे उस बात पर जिससे इन्दिरा और संजय खुद अपना चुनाव हार गए थे।

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