सांस्कृतिक संगठनो के सपनों का भारत!

जिस दिन से मोदी सरकार आई है, कुछ कथित सांस्कृतिक संगठन अपने सपनों का भारत बनाने में जुटे हुए हैं| इन संगठनों में प्रमुख संगठन है विश्व हिन्दू परिषद (विहीप) और राष्ट्रीय स्वयं सेवक दल (आरएसएस)| वैसे तो इन संगठन से जुड़े सारे लोगों का अपना अलग एजेंडा होता है, लेकिन काफी समय से इन सांस्कृतिक संगठनों का मुख्य मुद्दा हिंदुत्व रहा है और इनका राजनैतिक चेहरा भारतीय जनता पार्टी रहा है| हालाँकि ये खुद को की राजनैतिक खेमे से जुड़े होने से इनकार करते रहे है, पर आज की सरकार पर और उसकी गतिविधियोंं पर नजर डालें तो कोई भी ये कह सकता है की ये संगठन कहीं न कहीं भाजपा से जुड़े हुए है|

खुद प्रधानमंत्री मोदी का भी चयन प्रधानमंत्री के लिए आरएसएस के दबाव में लिया गया और आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सरीखे अनुभवी नेताओं को सरकार से बहार का रास्ता दिखा दिया गया| साधु साध्वियों को सरकार में लिया जाना भी इसी पर आधारित फैसलों में से एक है| सबसे बड़ी बात की सरकार में ना कोई इनके खिलाफ बोल सकता है ना ही इनकी नीतियों के खिलाफ बोल सकता है, स्वयं प्रधानमंत्री भी नहीं| गोडसे को राष्ट्र भक्त बोला गया संसद में पर कोई भी इसके खिलाफ नहीं बोला| इनके प्रमुख नेता है मोहन भागवत, अशोक सिंघल, डॉ. प्रवीण भाई तोगड़िया|

सबसे पहले ये पुरे भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते है| इसके लिए विहिप ने अपने घर वापसी कार्यक्रम की शुरुआत की है| इसके तहत ये सभी अन्य धर्मों के लोगों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें हिन्दू बनाना चाहते है| इसके लिए इन्होंने एक समिति बनाई है जिसे धर्म जागरण मंच का नाम दिया गया है| इसके अनुसार ये सबसे पहले भारत में रह रहे अन्य धर्म के लोगों की घर वापसी फिर NRI की घर वापसी और 2021 तक सम्पूर्ण भारत को मुस्लिम और क्रिश्चियन्स से मुक्त करना| अब क्या इस तरह से धर्मांतरण को आप सही ठहराएंगे|

Akhand Bharat

दूसरा एजेंडा हैं इनका अखंड भारत का| इसके तहत ये पाकिस्तान को भारत में मिलाना चाहते हैं और प्रधानमंत्री मोदी ऐसा करने में सक्षम है जैसा की विहिप अध्यक्ष अशोक सिंघल ने कुछ समय पहले कहा था| उन्होंने तो ये तक कह डाला की भारत में रहने वाला प्रत्येक नागरिक हिन्दू हैं| अब देखना ये है की उनके इस सपने को कौन और पूरा करता है|

इसके अलावा इनके कुछ और भी सपने है जिनमें से सबसे बड़ा सपना है रामराज्य का और राम मंदिर बनाने का सपना जो की भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र का भी हिस्सा है| हालाँकि इस सपने के बारे में खुद मोदी सरकार ने सरकार गठन के बाद कोई चर्चा नहीं की और इससे जुड़े सभी सवालों से दुरी बनाये रखी है| ये सभी संगठन इस मुद्दे पर एकमत है और जब भी मौका मिलता है वो इससे जुड़े अपने सपनों को बयान भी करते रहते है| लव जिहाद, हिन्दू हितों की रक्षा, सामान नागरिक कानून भी इन्हीं से जुड़े मुद्दों से एक है|

क्या एक आम हिंदुस्तानी को फर्क पड़ता है इन मुद्दों से? क्या हिन्दू धर्म इतना लचर है की उसे अपनी रक्षा के लिए ऐसे संगठनों की जरुरत है? क्या भारत किसी एक धर्म निरपेक्ष राष्टृ नहीं है? क्या मोदी सरकार के कार्यकाल में इन सगठनो को इतनी छूट आगे भी मिलती रहेगी?

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